मुझे फिक्र नहीं अंजाम की, मैं तो मुसाफिर हूँ राह का;
चलता हूँ ,रुकता हूँ, रुक कर फिर चलता हूँ!
मुझे ख्वाब देखने का शौक नहीं, बस आरजू हैं उड़ने की;
उड़ता हूँ ,गिरता हूँ , उठ कर फिर उड़ता हूँ !
देखता हूँ दिन को निकलते हुए ,साँझ को ढलते हुए;
जिंदगी को नित नए करवट बदलते हुए - मैं चलते हुए!
सिलसिला है जो थमता नहीं,मेरे साथ यह वक़्त भी चलता हैं
रुक भी जाऊ मैं कहीं, पर यह नहीं समझता हैं!
रुक भी जाऊ मैं कहीं, पर यह नहीं समझता हैं!
मेरी मुस्कान ही मेरी पहचान हैं,उन आंसुओ पर मत जाना जो आँखों में मेरी पलते हैं;
दर्द मुझे अपना नहीं, यह तो दुसरो के दर्द पर निकलते हैं!
दर्द मुझे अपना नहीं, यह तो दुसरो के दर्द पर निकलते हैं!
मैं पत्थर दिल नहीं, एहसास मुझमे भी मचलते हैं;
बस लफ्जो से नहीं, आँखों से मेरी झलकते हैं!
बदल रहा हूँ हर रोज मैं,सुबह-शाम की तरह,
सिर्फ देखो नहीं, समझो मुझे;
सिर्फ देखो नहीं, समझो मुझे;
"मैं कल कुछ और था, मैं आज कुछ और हूँ, मेरा कल कुछ और होगा!"
चलता हूँ ,रुकता हूँ, रुक कर फिर चलता हूँ!
मुझे ख्वाब देखने का शौक नहीं, बस आरजू हैं उड़ने की;
उड़ता हूँ ,गिरता हूँ , उठ कर फिर उड़ता हूँ !!!
Outstanding...!!! Superb Poem...!!! Great..!!
ReplyDelete@vedang.... Thank you
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